रविवार, 7 दिसंबर 2014

श्री देव राधा गोविन्द जी की जय
मोक्षदा एकादशी महा महोत्सव
आप सभी को मोक्षदा एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ ,
हरी ॐ नमो नारायणा
युधिष्ठिर बोले: देवदेवेश्वर ! मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में कौन
सी एकादशी होती है ? उसकी क्या विधि है तथा उसमें किस
देवता का पूजन किया जाता है? स्वामिन् ! यह सब यथार्थ रुप से
बताइये ।
श्रीकृष्ण ने कहा : नृपश्रेष्ठ ! मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष
की एकादशी का वर्णन करुँगा, जिसके श्रवणमात्र से वाजपेय
यज्ञ का फल मिलता है । उसका नाम ‘मोक्षदा एकादशी’ है
जो सब पापों का अपहरण करनेवाली है । राजन् ! उस दिन
यत्नपूर्वक तुलसी की मंजरी तथा धूप दीपादि से भगवान दामोदर
का पूजन करना चाहिए । पूर्वाक्त विधि से ही दशमी और
एकादशी के नियम का पालन करना उचित है ।
मोक्षदा एकादशी बड़े-बड़े पातकों का नाश करनेवाली है । उस
दिन रात्रि में मेरी प्रसन्न्ता के लिए नृत्य, गीत और स्तुति के
द्वारा जागरण करना चाहिए । जिसके पितर पापवश नीच
योनि में पड़े हों, वे इस एकादशी का व्रत करके इसका पुण्यदान
अपने पितरों को करें तो पितर मोक्ष को प्राप्त होते हैं । इसमें
तनिक भी संदेह नहीं है ।
पूर्वकाल की बात है, वैष्णवों से विभूषित परम रमणीय चम्पक नगर
में वैखानस नामक राजा रहते थे । वे अपनी प्रजा का पुत्र
की भाँति पालन करते थे । इस प्रकार राज्य करते हुए राजा ने एक
दिन रात को स्वप्न में अपने पितरों को नीच योनि में पड़ा हुआ
देखा । उन सबको इस अवस्था में देखकर राजा के मन में बड़ा विस्मय
हुआ और प्रात: काल ब्राह्मणों से उन्होंने उस स्वप्न
का सारा हाल कह सुनाया ।
राजा बोले: ब्रह्माणो ! मैने अपने पितरों को नरक में गिरा हुआ
देखा है । वे बारंबार रोते हुए मुझसे यों कह रहे थे कि : ‘तुम हमारे तनुज
हो, इसलिए इस नरक समुद्र से हम लोगों का उद्धार करो। ’
द्विजवरो ! इस रुप में मुझे पितरों के दर्शन हुए हैं इससे मुझे चैन
नहीं मिलता । क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? मेरा हृदय रुँधा जा रहा है ।
द्विजोत्तमो ! वह व्रत, वह तप और वह योग, जिससे मेरे पूर्वज
तत्काल नरक से छुटकारा पा जायें, बताने की कृपा करें । मुझ
बलवान तथा साहसी पुत्र के जीते जी मेरे माता पिता घोर नरक
में पड़े हुए हैं ! अत: ऐसे पुत्र से क्या लाभ है ?
ब्राह्मण बोले: राजन् ! यहाँ से निकट ही पर्वत मुनि का महान
आश्रम है । वे भूत और भविष्य के भी ज्ञाता हैं । नृपश्रेष्ठ ! आप
उन्हीं के पास चले जाइये ।
ब्राह्मणों की बात सुनकर महाराज वैखानस शीघ्र ही पर्वत
मुनि के आश्रम पर गये और वहाँ उन मुनिश्रेष्ठ को देखकर उन्होंने
दण्डवत् प्रणाम करके मुनि के चरणों का स्पर्श किया । मुनि ने
भी राजा से राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी ।
राजा बोले: स्वामिन् ! आपकी कृपा से मेरे राज्य के सातों अंग
सकुशल हैं किन्तु मैंने स्वप्न में देखा है कि मेरे पितर नरक में पड़े हैं ।
अत: बताइये कि किस पुण्य के प्रभाव से उनका वहाँ से
छुटकारा होगा ?
राजा की यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ पर्वत एक मुहूर्त तक ध्यानस्थ
रहे । इसके बाद वे राजा से बोले :
‘महाराज! मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष में जो ‘मोक्षदा’ नाम
की एकादशी होती है, तुम सब लोग उसका व्रत करो और
उसका पुण्य पितरों को दे डालो । उस पुण्य के प्रभाव से
उनका नरक से उद्धार हो जायेगा ।’
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: युधिष्ठिर ! मुनि की यह बात सुनकर
राजा पुन: अपने घर लौट आये । जब उत्तम मार्गशीर्ष मास आया,
तब राजा वैखानस ने मुनि के कथनानुसार ‘मोक्षदा एकादशी’
का व्रत करके उसका पुण्य समस्त पितरोंसहित पिता को दे
दिया । पुण्य देते ही क्षणभर में आकाश से फूलों की वर्षा होने
लगी । वैखानस के पिता पितरोंसहित नरक से छुटकारा पा गये और
आकाश में आकर राजा के प्रति यह पवित्र वचन बोले: ‘बेटा !
तुम्हारा कल्याण हो ।’ यह कहकर वे स्वर्ग में चले गये ।
राजन् ! जो इस प्रकार कल्याणमयी ‘मोक्षदा एकादशी’
का व्रत करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और मरने के बाद वह
मोक्ष प्राप्त कर लेता है । यह मोक्ष
देनेवाली ‘मोक्षदा एकादशी’ मनुष्यों के लिए चिन्तामणि के
समान समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाली है । इस माहात्मय के
पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ।

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