शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

दोस्तो कहानी थोड़ी पुरानी है पर अच्छी है जरूर पढ़े,
पिताजी केअचानक आ धमकने से
पत्नी तमतमा उठी--
“लगता है, बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है
वर्ना यहाँ कौन आनेवाला था! अपने पेट
का गड्ढ़ा भरता नहीं,
घरवालों का कहाँ से भरोगे?” मैं नज़रें बचाकर
दूसरी ओर देखनेलगा।
पिताजी नल परहाथ-मुँह धोकर सफ़र की थकान दूर
कर रहे थे। इस बार
मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे
का जूता फट चुका है।वह स्कूल जाते वक्त रोज
भुनभुनाता है।
पत्नी के इलाज केलिए
पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं।
बाबूजी को भी अभी आना था। घर में बोझिल
चुप्पी पसरी हुई थी। खाना खा चुकने पर
पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया।
मैंशंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आये
होंगे। पिताजी कुर्सी पर उठ कर बैठ गए। एकदम
बेफिक्र।
“सुनो”
कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा । मैं सांस
रोकर उनकेमुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान
बनकर अगला वाक्य सुननेकेलिए चौकन्ना था।
वे बोले, “खेती केकाम में घड़ी भर भी फुर्सत
नहीं मिलती। इस बखत काम का जोर है।रात
की गाड़ी से वापस जाऊँगा। तीन महीने
सेतुम्हारी कोई
चिट्ठी तक नहीं मिली। जब तुम परेशान होते हो,
तभी ऐसा करते हो।" उन्होंने
जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ
बढ़ा दिए, “रख लो। तुम्हारे
काम आएंगे। धान की फसल अच्छी हो गई थी। घर
मेंकोई दिक्कत नहीं है।तुम बहुत कमजोर लग रहे हो।ढंग
से खाया-
पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।" मैं कुछ
नहींबोल पाया।शब्द जैसे मेरे हलक में फंसकररह गये
हों। मैं कुछकहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से
डांटा,
“ले लो।
बहुत बड़े हो गये हो क्या?”
“नहीं तो।" मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने
नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले
पिताजी मुझे स्कूल भेजने केलिए
इसी तरह हथेली परअठन्नी टिका देते थे, पर तब
मेरी नज़रेंआजकी तरह झुकी नहीं होती थीं।
दोस्तों एक बात हमेशा ध्यान रखे माँ बाप अपने
बच्चो पर बोझ हो सकते हैं बच्चे उन पर
बोझ कभी नही होते है। अगर इस कहानी ने आपके
दिल को छुआ
हो तो अपनी राय जरूर दे।।।।

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